श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.24.67

नवम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

पृथ्व्याः स वै गुरुभरं क्षपयन् कुरूणा-

मन्तःसमुत्थकलिना युधि भूपचम्वः।

दृष्ट्या विधूय विजये जयमुद्विघोष्य

प्रोच्योद्धवाय च परं समगात् स्वधाम॥ ६७

pṛthvyāḥ sa vai gurubharaṃ kṣapayan kurūṇā-

mantaḥsamutthakalinā yudhi bhūpacamvaḥ|

dṛṣṭyā vidhūya vijaye jayamudvighoṣya

procyoddhavāya ca paraṃ samagāt svadhāma|| 67

अर्थ

कौरव और पाण्डवोंके बीच उत्पन्‍न हुए आपसके कलहसे उन्होंने पृथ्वीका बहुत-सा भार हलका कर दिया तथा युद्धमें अपनी दृष्टिसे ही राजाओंकी बहुत-सी अक्षौहिणियोंको ध्वंस करके संसारमें अर्जुनकी जीतका डंका पिटवा दिया। फिर उद्धवको आत्मतत्त्वका उपदेश किया और इसके बाद वे अपने परमधामको सिधार गये॥ ६७॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्र्यां पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे श्रीसूर्यसोमवंशानुकीर्तने यदुवंशानुकीर्तनं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः॥ २४॥

इति नवमः स्कन्धः समाप्तः

हरिः ॐ तत्सत्

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