श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.3.11

नवम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

कस्यचित् त्वथ कालस्य नासत्यावाश्रमागतौ।

तौ पूजयित्वा प्रोवाच वयो मे दत्तमीश्‍वरौ॥ ११

kasyacit tvatha kālasya nāsatyāvāśramāgatau|

tau pūjayitvā provāca vayo me dattamīśvarau|| 11

अर्थ

कुछ समय बीत जानेपर उनके आश्रमपर दोनों अश्‍विनीकुमार आये। च्यवन मुनिने उनका यथोचित सत्कार किया और कहा कि ‘आप दोनों समर्थ हैं, इसलिये मुझे युवा-अवस्था प्रदान कीजिये। मेरा रूप एवं अवस्था ऐसी कर दीजिये, जिसे युवती स्त्रियाँ चाहती हैं। मैं जानता हूँ कि आपलोग सोमपानके अधिकारी नहीं हैं, फिर भी मैं आपको यज्ञमें सोमरसका भाग दूँगा’॥ ११-१२॥✎ 1631

यह अर्थ श्लोक 11–12 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1631 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: तुम-लोगोंने → तुमलोगोंने

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