‘दुष्टे! यह तूने क्या किया? क्या तूने सबके वन्दनीय च्यवन मुनिको धोखा दे दिया? अवश्य ही तूने उनको बूढ़ा और अपने कामका न समझकर छोड़ दिया और अब तू इस राह चलते जार पुरुषकी सेवा कर रही है॥ २०॥
चिकीर्षितं ते किमिदं पतिस्त्वया
प्रलम्भितो लोकनमस्कृतो मुनिः।
यत् त्वं जराग्रस्तमसत्यसम्मतं
विहाय जारं भजसेऽमुमध्वगम्॥ २०
‘दुष्टे! यह तूने क्या किया? क्या तूने सबके वन्दनीय च्यवन मुनिको धोखा दे दिया? अवश्य ही तूने उनको बूढ़ा और अपने कामका न समझकर छोड़ दिया और अब तू इस राह चलते जार पुरुषकी सेवा कर रही है॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.3.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 16) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/3/20/