श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.1

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

अथ चतुर्थोऽध्यायः

नाभाग और अम्बरीषकी कथा

श्रीशुक उवाच

नाभागो नभगापत्यं यं ततं भ्रातरः कविम्।

यविष्ठं व्यभजन् दायं ब्रह्मचारिणमागतम्॥ १

nābhāgo nabhagāpatyaṃ yaṃ tataṃ bhrātaraḥ kavim|

yaviṣṭhaṃ vyabhajan dāyaṃ brahmacāriṇamāgatam|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! मनुपुत्र नभगका पुत्र था नाभाग। जब वह दीर्घकालतक ब्रह्मचर्यका पालन करके लौटा, तब बड़े भाइयोंने अपनेसे छोटे किन्तु विद्वान् भाईको हिस्सेमें केवल पिताको ही दिया (सम्पत्ति तो उन्होंने पहले ही आपसमें बाँट ली थी)॥ १॥

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