नास्पृशद् ब्रह्मशापोऽपि यं न प्रतिहतः क्वचित्॥ १३
nābhāgādambarīṣo'bhūnmahābhāgavataḥ kṛtī|
nāspṛśad brahmaśāpo'pi yaṃ na pratihataḥ kvacit|| 13
अर्थ
नाभागके पुत्र हुए अम्बरीष। वे भगवान्के बड़े प्रेमी एवं उदार धर्मात्मा थे। जो ब्रह्मशाप कभी कहीं रोका नहीं जा सका, वह भी अम्बरीषका स्पर्श न कर सका॥ १३॥
नाभागादम्बरीषोऽभून्महाभागवतः कृती।
नास्पृशद् ब्रह्मशापोऽपि यं न प्रतिहतः क्वचित्॥ १३
नाभागके पुत्र हुए अम्बरीष। वे भगवान्के बड़े प्रेमी एवं उदार धर्मात्मा थे। जो ब्रह्मशाप कभी कहीं रोका नहीं जा सका, वह भी अम्बरीषका स्पर्श न कर सका॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 9.4.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 20) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/9/4/13/