श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.21

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

एवं सदा कर्मकलापमात्मनः

परेऽधियज्ञे भगवत्यधोक्षजे।

सर्वात्मभावं विदधन्महीमिमां

तन्‍निष्ठविप्राभिहितः शशास ह॥ २१

evaṃ sadā karmakalāpamātmanaḥ

pare'dhiyajñe bhagavatyadhokṣaje|

sarvātmabhāvaṃ vidadhanmahīmimāṃ

tanniṣṭhaviprābhihitaḥ śaśāsa ha|| 21

अर्थ

इस प्रकार उन्होंने अपने सारे कर्म यज्ञपुरुष, इन्द्रियातीत भगवान्‌के प्रति उन्हें सर्वात्मा एवं सर्वस्वरूप समझकर समर्पित कर दिये थे और भगवद्भक्त ब्राह्मणोंकी आज्ञाके अनुसार वे इस पृथ्वीका शासन करते थे॥ २१॥

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