श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.53

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

ब्रह्मोवाच

स्थानं मदीयं सहविश्‍वमेतत्

क्रीडावसाने द्विपरार्धसंज्ञे।

भ्रूभंगमात्रेण हि संदिधक्षोः

कालात्मनो यस्य तिरोभविष्यति॥ ५३

sthānaṃ madīyaṃ sahaviśvametat

krīḍāvasāne dviparārdhasaṃjñe|

bhrūbhaṃgamātreṇa hi saṃdidhakṣoḥ

kālātmano yasya tirobhaviṣyati|| 53

अर्थ

ब्रह्माजीने कहा—‘जब मेरी दो परार्धकी आयु समाप्त होगी और कालस्वरूप भगवान् अपनी यह सृष्टिलीला समेटने लगेंगे और इस जगत‍्को जलाना चाहेंगे, उस समय उनके भ्रूभंगमात्रसे यह सारा संसार और मेरा यह लोक भी लीन हो जायगा॥ ५३॥✎ 1635

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1635 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्रजा-पति, → प्रजापति,

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