श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.4.68

नवम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम् २।

मदन्यत् ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥ ६८

sādhavo hṛdayaṃ mahyaṃ sādhūnāṃ hṛdayaṃ tvaham |

madanyat te na jānanti nāhaṃ tebhyo manāgapi|| 68

अर्थ

दुर्वासाजी! मैं आपसे और क्या कहूँ, मेरे प्रेमी भक्त तो मेरे हृदय हैं और उन प्रेमी भक्तोंका हृदय स्वयं मैं हूँ। वे मेरे अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते तथा मैं उनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं जानता॥ ६८॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    ह्यहम्।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 27)

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