श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.5.1

नवम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

अथ पञ्चमोऽध्यायः

दुर्वासाजीकी दुःखनिवृत्ति

श्रीशुक उवाच

एवं भगवताऽऽदिष्टो दुर्वासाश्‍चक्रतापितः।

अम्बरीषमुपावृत्य तत्पादौ दुःखितोऽग्रहीत्॥ १

evaṃ bhagavatā''diṣṭo durvāsāścakratāpitaḥ|

ambarīṣamupāvṛtya tatpādau duḥkhito'grahīt|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब भगवान्‌ने इस प्रकार आज्ञा दी तब सुदर्शन चक्रकी ज्वालासे जलते हुए दुर्वासा लौटकर राजा अम्बरीषके पास आये और उन्होंने अत्यन्त दुःखी होकर राजाके पैर पकड़ लिये॥ १॥

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