श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.5.17

नवम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

राजन्‍ननुगृहीतोऽहं१ त्वयातिकरुणात्मना।

मदघं पृष्ठतः कृत्वा प्राणा यन्मेऽभिरक्षिताः॥ १७

rājannanugṛhīto'haṃ tvayātikaruṇātmanā|

madaghaṃ pṛṣṭhataḥ kṛtvā prāṇā yanme'bhirakṣitāḥ|| 17

अर्थ

महाराज अम्बरीष! आपका हृदय करुणाभावसे परिपूर्ण है। आपने मेरे ऊपर महान् अनुग्रह किया। अहो, आपने मेरे अपराधको भुलाकर मेरे प्राणोंकी रक्षा की है!॥ १७॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    तोऽस्मि।

    (मुद्रित पृष्ठ 30)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें