श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.6.35

नवम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

ईजे च यज्ञं क्रतुभिरात्मविद् भूरिदक्षिणैः।

सर्वदेवमयं देवं सर्वात्मकमतीन्द्रियम्॥ ३५

īje ca yajñaṃ kratubhirātmavid bhūridakṣiṇaiḥ|

sarvadevamayaṃ devaṃ sarvātmakamatīndriyam|| 35

अर्थ

वे यद्यपि आत्मज्ञानी थे, उन्हें कर्म-काण्डकी कोई विशेष आवश्यकता नहीं थी—फिर भी उन्होंने बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञोंसे उन यज्ञस्वरूप प्रभुकी आराधना की जो स्वयंप्रकाश, सर्वदेवस्वरूप, सर्वात्मा एवं इन्द्रियातीत हैं॥ ३५॥✎ 1636

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1636 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुत्र-प्राप्तिके → पुत्रप्राप्तिके

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