श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.6.41

नवम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

स विचिन्त्याप्रियं स्त्रीणां जरठोऽयमसम्मतः।

वलीपलित एजत्क इत्यहं प्रत्युदाहृतः॥ ४१

sa vicintyāpriyaṃ strīṇāṃ jaraṭho'yamasammataḥ|

valīpalita ejatka ityahaṃ pratyudāhṛtaḥ|| 41

अर्थ

सौभरि ऋषि राजा मान्धाताका अभिप्राय समझ गये। उन्होंने सोचा कि ‘राजाने इसलिये मुझे ऐसा सूखा जवाब दिया है कि अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ, शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयी हैं, बाल पक गये हैं और सिर काँपने लगा है! अब कोई स्त्री मुझसे प्रेम नहीं कर सकती॥ ४१॥

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