श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.6.51

नवम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

संगं त्यजेत मिथुनव्रतिनां मुमुक्षुः

सर्वात्मना न विसृजेद् बहिरिन्द्रियाणि।

एकश्‍चरन् रहसि चित्तमनन्त ईशे

युंजीत तद्व्रतिषु साधुषु चेत् प्रसंगः॥ ५१

saṃgaṃ tyajeta mithunavratināṃ mumukṣuḥ

sarvātmanā na visṛjed bahirindriyāṇi|

ekaścaran rahasi cittamananta īśe

yuṃjīta tadvratiṣu sādhuṣu cet prasaṃgaḥ|| 51

अर्थ

अतः जिसे मोक्षकी इच्छा है, उस पुरुषको चाहिये कि वह भोगी प्राणियोंका संग सर्वथा छोड़ दे और एक क्षणके लिये भी अपनी इन्द्रियोंको बहिर्मुख न होने दे। अकेला ही रहे और एकान्तमें अपने चित्तको सर्वशक्तिमान् भगवान्‌में ही लगा दे। यदि संग करनेकी आवश्यकता ही हो तो भगवान्‌के अनन्यप्रेमी निष्ठावान् महात्माओंका ही संग करे॥ ५१॥

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