श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.7.1

नवम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

अथ सप्तमोऽध्यायः

राजा त्रिशङ्कु और हरिश्‍चन्द्रकी कथा

श्रीशुक उवाच

मान्धातुः पुत्रप्रवरो योऽम्बरीषः प्रकीर्तितः।

पितामहेन प्रवृतो यौ१वनाश्‍वश्‍च तत्सुतः।

हा२रीतस्तस्य पुत्रोऽभून्मान्धातृप्रवरा इमे॥ १ ✎ 969

māndhātuḥ putrapravaro yo'mbarīṣaḥ prakīrtitaḥ|

pitāmahena pravṛto yauvanāśvaśca tatsutaḥ|

hārītastasya putro'bhūnmāndhātṛpravarā ime|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! मैं वर्णन कर चुका हूँ कि मान्धाताके पुत्रोंमें सबसे श्रेष्ठ अम्बरीष थे। उनके दादा युवनाश्‍वने उन्हें पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया। उनका पुत्र हुआ यौवनाश्‍व और यौवनाश्‍वका हारीत। मान्धाताके वंशमें ये तीन अवान्तर गोत्रोंके प्रवर्तक हुए॥ १॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    युव०।

    (मुद्रित पृष्ठ 38)
  2. २

    हरीत०।

    (मुद्रित पृष्ठ 38)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #969 शब्दोंके बीचका स्थान: हा रीतस्तस्य → हारीतस्तस्य

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