श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.7.5

नवम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

तस्य सत्यव्रतः पुत्रस्त्रिशंकुरिति विश्रुतः।

प्राप्तश्‍चाण्डालतां शापाद् गुरोः कौशिकतेजसा॥ ५

tasya satyavrataḥ putrastriśaṃkuriti viśrutaḥ|

prāptaścāṇḍālatāṃ śāpād guroḥ kauśikatejasā|| 5

अर्थ

त्रिबन्धनके पुत्र सत्यव्रत हुए। यही सत्यव्रत त्रिशंकुके नामसे विख्यात हुए। यद्यपि त्रिशंकु अपने पिता और गुरुके शापसे चाण्डाल हो गये थे, परन्तु विश्‍वामित्रजीके प्रभावसे वे सशरीर स्वर्गमें चले गये। देवताओंने उन्हें वहाँसे ढकेल दिया और वे नीचेको सिर किये हुए गिर पड़े; परन्तु विश्‍वामित्रजीने अपने तपोबलसे उन्हें आकाशमें ही स्थिर कर दिया। वे अब भी आकाशमें लटके हुए दीखते हैं॥ ५-६॥

यह अर्थ श्लोक 5–6 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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