श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 9.8.25

नवम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

प्रशान्तमायागुणकर्मलिंग-

मनामरूपं सदसद्वि३मुक्तम्।

ज्ञानोपदेशाय गृहीतदेहं४

नमामहे त्वां पुरुषं पुराणम्॥ २५

praśāntamāyāguṇakarmaliṃga-

manāmarūpaṃ sadasadvimuktam|

jñānopadeśāya gṛhītadehaṃ

namāmahe tvāṃ puruṣaṃ purāṇam|| 25

अर्थ

माया, उसके गुण और गुणोंके कारण होनेवाले कर्म एवं कर्मोंके संस्कारसे बना हुआ लिंगशरीर आपमें है ही नहीं। न तो आपका नाम है और न तो रूप। आपमें न कार्य है और न तो कारण। आप सनातन आत्मा हैं। ज्ञानका उपदेश करनेके लिये ही आपने यह शरीर धारण कर रखा है। हम आपको नमस्कार करते हैं॥ २५॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    द्वियुक्तम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 44)
  2. ४

    तलिंगं।

    (मुद्रित पृष्ठ 44)

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