श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.2.31

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

वृषभानुसुताकान्तविहारे कीर्तनश्रिया।

साक्षादिव समावृत्ते सर्वेऽनन्यदृशोऽभवन्॥ ३१

vṛṣabhānusutākāntavihāre kīrtanaśriyā|

sākṣādiva samāvṛtte sarve'nanyadṛśo'bhavan|| 31

अर्थ

वृषभानु-नन्दिनी श्रीराधाजी तथा उनके प्रियतम श्रीकृष्णकी वह लीलाभूमि जब साक्षात् संकीर्तनकी शोभासे सम्पन्‍न हो गयी, उस समय वहाँ रहनेवाले सभी भक्तजन एकाग्र हो गये; उनकी दृष्टि, उनके मनकी वृत्ति कहीं अन्यत्र न जाती थी॥ ३१॥

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