श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.3.31

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

भोगार्थिभ्यस्तु यज्ञादिफलं दास्यामि निश्‍चितम्।

मोक्षार्थिभ्यो विरक्तेभ्यो मुक्तिं पञ्चविधां तथा॥ ३१

bhogārthibhyastu yajñādiphalaṃ dāsyāmi niścitam|

mokṣārthibhyo viraktebhyo muktiṃ pañcavidhāṃ tathā|| 31

अर्थ

जो भोगोंकी इच्छा रखनेवाले हैं, उन्हें अवश्य ही उनके किये हुए यज्ञादि कर्मोंका फल अर्पण करूँगा; तथा जो संसारबन्धनसे मुक्त होना चाहते हैं, विरक्त हैं, उन्हें उनके इच्छानुसार पाँच प्रकारकी मुक्ति भी देता रहूँगा॥ ३१॥

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