संसारके मनुष्य नाना प्रकारके कर्मोंमें रचे-पचे हुए हैं, ये लोग आजतक प्रायः भागवत-श्रवणकी बात भी नहीं जानते॥ ६१॥
एतावत्कालपर्यन्तं प्रायो भागवतश्रुतेः।
वार्तामपि न जानन्ति मनुष्याः कर्मतत्पराः॥ ६१
संसारके मनुष्य नाना प्रकारके कर्मोंमें रचे-पचे हुए हैं, ये लोग आजतक प्रायः भागवत-श्रवणकी बात भी नहीं जानते॥ ६१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.3.61 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 1000) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/skanda/3/61/