॥ श्रीहरिः ॥
श्रोतारोऽथ निरूप्यन्ते श्रीमद्विष्णुकथाश्रयाः।
प्रवरा अवराश्चेति श्रोतारो द्विविधा मताः॥ १०
śrotāro'tha nirūpyante śrīmadviṣṇukathāśrayāḥ|
pravarā avarāśceti śrotāro dvividhā matāḥ|| 10
अर्थ
अब भगवान् श्रीकृष्णकी कथाका आश्रय लेनेवाले श्रोताओंका वर्णन करते हैं। श्रोता दो प्रकारके माने गये हैं—प्रवर (उत्तम) तथा अवर (अधम)॥ १०॥
श्रोतारोऽथ निरूप्यन्ते श्रीमद्विष्णुकथाश्रयाः।
प्रवरा अवराश्चेति श्रोतारो द्विविधा मताः॥ १०
अब भगवान् श्रीकृष्णकी कथाका आश्रय लेनेवाले श्रोताओंका वर्णन करते हैं। श्रोता दो प्रकारके माने गये हैं—प्रवर (उत्तम) तथा अवर (अधम)॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण POST.4.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 1003) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/mahatmya/skanda/4/10/