॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक POST.4.12
अखिलोपेक्षया यस्तु कृष्णशास्त्रश्रुतौ व्रती।
स चातको यथाम्भोदमुक्ते पाथसि चातकः॥ १२
akhilopekṣayā yastu kṛṣṇaśāstraśrutau vratī|
sa cātako yathāmbhodamukte pāthasi cātakaḥ|| 12
अर्थ
‘चातक’ कहते हैं पपीहेको। वह जैसे बादलसे बरसते हुए जलमें ही स्पृहा रखता है, दूसरे जलको छूता ही नहीं—उसी प्रकार जो श्रोता सब कुछ छोड़कर केवल श्रीकृष्णसम्बन्धी शास्त्रोंके श्रवणका व्रत ले लेता है, वह ‘चातक’ कहा गया है॥ १२॥