॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक POST.4.16
यस्तुदन् रसिकाञ्छ्रोतॄन् विरौत्यज्ञो वृको हि सः।✎ 1255
वेणुस्वनरसासक्तान् वृकोऽरण्ये मृगान् यथा॥ १६
yastudan rasikāñchrotṝn virautyajño vṛko hi saḥ|
veṇusvanarasāsaktān vṛko'raṇye mṛgān yathā|| 16
अर्थ
(ये प्रवर अर्थात् उत्तम श्रोताओंके भेद बताये गये हैं, अब अवर यानी अधम श्रोता बताये जाते हैं।) ‘वृक’ कहते हैं भेड़ियेको। जैसे भेड़िया वनके भीतर वेणुकी मीठी आवाज सुननेमें लगे हुए मृगोंको डरानेवाली भयानक गर्जना करता है, वैसे ही जो मूर्ख कथाश्रवणके समय रसिक श्रोताओंको उद्विग्न करता हुआ बीच-बीचमें जोर-जोरसे बोल उठता है, वह ‘वृक’ कहलाता है॥ १६॥