श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक POST.4.41

श्रीमद्भागवतमाहात्म्य (स्कन्दपुराण) · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

धनार्थिनस्तु संसिद्धिर्विधिसम्पूर्णतावशात्।

कृष्णार्थिनोऽगुणस्यापि प्रेमैव विधिरुत्तमः॥ ४१

dhanārthinastu saṃsiddhirvidhisampūrṇatāvaśāt|

kṛṣṇārthino'guṇasyāpi premaiva vidhiruttamaḥ|| 41

अर्थ

पर धनार्थीको तो तभी सिद्धि मिलती है, जब उनके अनुष्ठानका विधि-विधान पूरा उतर जाय। श्रीकृष्णकी चाह रखनेवाला सर्वथा गुणहीन हो और उसकी विधिमें कुछ कमी रह जाय तो भी, यदि उसके हृदयमें प्रेम है तो, वही उसके लिये सर्वोत्तम विधि है॥ ४१॥

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