उद्धव और सात्यकि बड़े विचित्र चँवर डुलाने लगे। मार्गमें भगवान् श्रीकृष्णपर चारों ओरसे पुष्पोंकी वर्षा हो रही थी। बड़ी ही मधुर झाँकी थी॥ १८॥✎ 7778
उद्धवः सात्यकिश्चैव व्यजने परमाद्भुते।
विकीर्यमाणः कुसुमै रेजे मधुपतिः पथि॥ १८
उद्धव और सात्यकि बड़े विचित्र चँवर डुलाने लगे। मार्गमें भगवान् श्रीकृष्णपर चारों ओरसे पुष्पोंकी वर्षा हो रही थी। बड़ी ही मधुर झाँकी थी॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.10.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 127) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/10/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)