श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.10.19

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

अश्रूयन्ताशिषः सत्यास्तत्र तत्र द्विजेरिताः।

नानुरूपानुरूपाश्‍च निर्गुणस्य गुणात्मनः॥ १९

aśrūyantāśiṣaḥ satyāstatra tatra dvijeritāḥ|

nānurūpānurūpāśca nirguṇasya guṇātmanaḥ|| 19

अर्थ

जहाँ-तहाँ ब्राह्मणोंके दिये हुए सत्य आशीर्वाद सुनायी पड़ रहे थे। वे सगुण भगवान्‌के तो अनुरूप ही थे; क्योंकि उनमें सब कुछ है, परन्तु निर्गुणके अनुरूप नहीं थे, क्योंकि उनमें कोई प्राकृत गुण नहीं है॥ १९॥✎ 77 78

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #77 शब्दोंके बीचका स्थान: कोदेखती → को देखती
  • #78 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें