॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.11.18
वारणेन्द्रं पुरस्कृत्य ब्राह्मणैः२ ससुमङ्गलैः।
शङ्खतूर्यनिनादेन ब्रह्मघोषेण चादृताः।
vāraṇendraṃ puraskṛtya brāhmaṇaiḥ sasumaṅgalaiḥ|
śaṅkhatūryaninādena brahmaghoṣeṇa cādṛtāḥ|
pratyujjagmū rathairhṛṣṭāḥ praṇayāgatasādhvasāḥ|| 18
अर्थ
उदारशिरोमणि वसुदेव, अक्रूर, उग्रसेन, अद्भुत पराक्रमी बलराम, प्रद्युम्न, चारुदेष्ण और जाम्बवतीनन्दन साम्बने जब यह सुना कि हमारे प्रियतम भगवान् श्रीकृष्ण आ रहे हैं, तब उनके मनमें इतना आनन्द उमड़ा कि उन लोगोंने अपने सभी आवश्यक कार्य—सोना, बैठना और भोजन आदि छोड़ दिये। प्रेमके आवेगसे उनका हृदय उछलने लगा। वे मंगलशकुनके लिये एक गजराजको आगे करके स्वस्त्ययनपाठ करते हुए और मांगलिक सामग्रियोंसे सुसज्जित ब्राह्मणोंको साथ लेकर चले। शंख और तुरही आदि बाजे बजने लगे और वेदध्वनि होने लगी। वे सब हर्षित होकर रथोंपर सवार हुए और बड़ी आदरबुद्धिसे भगवान्की अगवानी करने चले॥ १६—१८॥✎ 80 81
टिप्पणियाँ
- २
प्रा० पा०—ब्राह्मणैस्तु सुमङ्गलैः।
- ३
प्रा० पा०—प्रतिजग्मू।
- ४
प्रा० पा०—रथैर्ब्रह्मन्।