॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.11.31
पत्न्यः पतिं प्रोष्य गृहानुपागतं विलोक्य सञ्जातमनोमहोत्सवाः।
उत्तस्थुरारात् सहसाऽऽसनाशयात्१ साकं व्रतैर्व्रीडितलोचनाननाः॥ ३१
patnyaḥ patiṃ proṣya gṛhānupāgataṃ vilokya sañjātamanomahotsavāḥ|
uttasthurārāt sahasā''sanāśayāt sākaṃ vratairvrīḍitalocanānanāḥ|| 31
अर्थ
अपने प्राणनाथ भगवान् श्रीकृष्णको बहुत दिन बाहर रहनेके बाद घर आया देखकर रानियोंके हृदयमें बड़ा आनन्द हुआ। उन्हें अपने निकट देखकर वे एकाएक ध्यान छोड़कर उठ खड़ी हुईं; उन्होंने केवल आसनको ही नहीं; बल्कि उन नियमोंको* भी त्याग दिया, जिन्हें उन्होंने पतिके प्रवासी होनेपर ग्रहण किया था। उस समय उनके मुख और नेत्रोंमें लज्जा छा गयी॥ ३१॥
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—सहसासनाश्रयात्सकञ्चुका व्रीडित०।
- *
जिस स्त्रीका पति विदेश गया हो, उसे इन नियमोंका पालन करना चाहिये।
क्रीडां शरीरसंस्कारं समाजोत्सवदर्शनम्।
हास्यं परगृहे यानं त्यजेत्प्रोषितभर्तृका॥
जिसका पति परदेश गया हो, उस स्त्रीको खेल-कूद, शृंगार, सामाजिक उत्सवोंमें भाग लेना, हँसी-मजाक करना और पराये घर जाना—इन पाँच कामोंको त्याग देना चाहिये। (याज्ञवल्क्यस्मृति)