॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.11.32
तमात्मजैर्दृष्टिभिरन्तरात्मना दुरन्तभावाः परिरेभिरे पतिम्।
निरुद्धमप्यास्रवदम्बु नेत्रयोर्विलज्जतीनां भृगुवर्य वैक्लवात्॥ ३२ ✎ 1523
tamātmajairdṛṣṭibhirantarātmanā durantabhāvāḥ parirebhire patim|
niruddhamapyāsravadambu netrayorvilajjatīnāṃ bhṛguvarya vaiklavāt|| 32
अर्थ
भगवान्के प्रति उनका भाव बड़ा ही गम्भीर था। उन्होंने पहले मन-ही-मन, फिर नेत्रोंके द्वारा और तत्पश्चात् पुत्रोंके बहाने शरीरसे उनका आलिंगन किया। शौनकजी! उस समय उनके नेत्रोंमें जो प्रेमके आँसू छलक आये थे, उन्हें संकोचवश उन्होंने बहुत रोका। फिर भी विवशताके कारण वे ढलक ही गये॥ ३२॥