श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.11.35

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

स एष नरलोकेऽस्मिन्‍नवतीर्णः स्वमायया।

रेमे स्त्रीरत्नकूटस्थो भगवान् प्राकृतो यथा॥ ३५

sa eṣa naraloke'sminnavatīrṇaḥ svamāyayā|

reme strīratnakūṭastho bhagavān prākṛto yathā|| 35

अर्थ

साक्षात् परमेश्‍वर ही अपनी लीलासे इस मनुष्यलोकमें अवतीर्ण हुए थे और सहस्रों रमणी-रत्नोंमें रहकर उन्होंने साधारण मनुष्यकी तरह क्रीडा की॥ ३५॥

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