श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.11.36

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

उद्दामभावपिशुनामलवल्गुहासव्रीडावलोकनिहतो मदनोऽपि यासाम्।✎ 1527

सम्मुह्य चापमजहात्प्रमदोत्तमास्ता यस्येन्द्रियं विमथितुं कुहकैर्न शेकुः॥ ३६

uddāmabhāvapiśunāmalavalguhāsavrīḍāvalokanihato madano'pi yāsām|

sammuhya cāpamajahātpramadottamāstā yasyendriyaṃ vimathituṃ kuhakairna śekuḥ|| 36

अर्थ

जिनकी निर्मल और मधुर हँसी उनके हृदयके उन्मुक्त भावोंको सूचित करनेवाली थी, जिनकी लजीली चितवनकी चोटसे बेसुध होकर विश्‍वविजयी कामदेवने भी अपने धनुषका परित्याग कर दिया था—वे कमनीय कामिनियाँ अपने काम-विलासोंसे जिनके मनमें तनिक भी क्षोभ नहीं पैदा कर सकीं, उन असंग भगवान् श्रीकृष्णको संसारके लोग अपने ही समान कर्म करते देखकर आसक्त मनुष्य समझते हैं—यह उनकी मूर्खता है॥ ३६-३७॥

यह अर्थ श्लोक 36–37 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1527 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: उद्दामभावपिशुनामलवल्गुहास- व्रीडावलोकनिहतो → उद्दामभावपिशुनामलवल्गुहासव्रीडावलोकनिहतो

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