श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.12.14

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

हिरण्यं गां महीं ग्रामान् हस्त्यश्वान्‍नृपतिर्वरान्३।

प्रादात्स्व४न्‍नं च विप्रेभ्यः प्रजातीर्थे स तीर्थवित्॥ १४

hiraṇyaṃ gāṃ mahīṃ grāmān hastyaśvānnṛpatirvarān|

prādātsvannaṃ ca viprebhyaḥ prajātīrthe sa tīrthavit|| 14

अर्थ

महाराज युधिष्ठिर दानके योग्य समयको जानते थे। उन्होंने प्रजातीर्थ* नामक कालमें अर्थात् नाल काटनेके पहले ही ब्राह्मणोंको सुवर्ण, गौएँ, पृथ्वी, गाँव, उत्तम जातिके हाथी-घोड़े और उत्तम अन्‍नका दान दिया॥ १४॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—हयांश्‍च नृपति०।

    (मुद्रित पृष्ठ 136)
  2. ४

    प्रा० पा०—प्रादात्स्वयं च।

    (मुद्रित पृष्ठ 136)
  3. *

    नालच्छेदनसे पहले सूतक नहीं होता, जैसे कहा है—‘यावन्‍न छिद्यते नालं तावन्‍नाप्नोति सूतकम्। छिन्‍ने नाले ततः पश्चात् सूतकं तु विधीयते॥’ इसी समयको ‘प्रजातीर्थ’ काल कहते हैं। इस समय जो दान दिया जाता है, वह अक्षय होता है। स्मृति कहती है—‘पुत्रे जाते व्यतीपाते दत्तं भवति चाक्षयम्।’ अर्थात् ‘पुत्रोत्पत्ति’ और व्यतीपातके समय दिया हुआ दान अक्षय होता है।’

    (मुद्रित पृष्ठ 136)

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