श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.12.4

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

सूत उवाच

अपीप२लद्धर्मराजः पितृवद् रञ्जयन् प्रजाः।

निःस्पृहः सर्वकामेभ्यः कृष्णपा३दाब्जसेवया॥ ४

apīpaladdharmarājaḥ pitṛvad rañjayan prajāḥ|

niḥspṛhaḥ sarvakāmebhyaḥ kṛṣṇapādābjasevayā|| 4

अर्थ

सूतजीने कहा—धर्मराज युधिष्ठिर अपनी प्रजाको प्रसन्‍न रखते हुए पिताके समान उसका पालन करने लगे। भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंके सेवनसे वे समस्त भोगोंसे निःस्पृह हो गये थे॥ ४॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—अपालयद्।

    (मुद्रित पृष्ठ 135)
  2. ३

    प्रा० पा०—पादानुसेवया।

    (मुद्रित पृष्ठ 135)

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