श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.12.6

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

किं ते कामाः सुरस्पार्हा मुकुन्दमनसो द्विजाः४।

अधिजह्रुर्मुदं राज्ञः क्षुधितस्य यथेतरे॥ ६

kiṃ te kāmāḥ suraspārhā mukundamanaso dvijāḥ|

adhijahrurmudaṃ rājñaḥ kṣudhitasya yathetare|| 6

अर्थ

उनके पास भोगकी ऐसी सामग्री थी, जिसके लिये देवतालोग भी लालायित रहते हैं। परन्तु जैसे भूखे मनुष्यको भोजनके अतिरिक्त दूसरे पदार्थ नहीं सुहाते, वैसे ही उन्हें भगवान्‌के सिवा दूसरी कोई वस्तु सुख नहीं देती थी॥ ६॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—द्विज।

    (मुद्रित पृष्ठ 135)

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