श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.11

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

अपि नः सुहृदस्तात बान्धवाः कृष्णदेवताः।✎ 1881

दृष्टाः श्रुता वा यदवः स्वपुर्यां सुखमासते॥ ११

api naḥ suhṛdastāta bāndhavāḥ kṛṣṇadevatāḥ|

dṛṣṭāḥ śrutā vā yadavaḥ svapuryāṃ sukhamāsate|| 11

अर्थ

चाचाजी! आप तीर्थयात्रा करते हुए द्वारका भी अवश्य ही गये होंगे। वहाँ हमारे सुहृद‍् एवं भाई-बन्धु यादवलोग, जिनके एकमात्र आराध्यदेव श्रीकृष्ण हैं, अपनी नगरीमें सुखसे तो हैं न? आपने यदि जाकर देखा नहीं होगा तो सुना तो अवश्य ही होगा॥ ११॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1881 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सृहृदस्तात → सुहृदस्तात

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