जैसे संसारमें खिलाड़ीकी इच्छासे ही खिलौनोंका संयोग और वियोग होता है, वैसे ही भगवान्की इच्छासे ही मनुष्योंका मिलना-बिछुड़ना होता है॥ ४२॥✎ 91
यथा क्रीडोपस्कराणां संयोगविगमाविह।
इच्छया क्रीडितुः स्यातां तथैवेशेच्छया नृणाम्॥ ४२
जैसे संसारमें खिलाड़ीकी इच्छासे ही खिलौनोंका संयोग और वियोग होता है, वैसे ही भगवान्की इच्छासे ही मनुष्योंका मिलना-बिछुड़ना होता है॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.13.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 144) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/13/42/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)