श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.47

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

तदिदं भगवान् राजन्‍नेक आत्माऽऽत्मनां स्वदृक्।

अन्तरोऽनन्तरो भाति पश्य तं माययोरुधा॥ ४७

tadidaṃ bhagavān rājanneka ātmā''tmanāṃ svadṛk|

antaro'nantaro bhāti paśya taṃ māyayorudhā|| 47

अर्थ

इन समस्त रूपोंमें जीवोंके बाहर और भीतर वही एक स्वयंप्रकाश भगवान्, जो सम्पूर्ण आत्माओंके आत्मा हैं, मायाके द्वारा अनेकों प्रकारसे प्रकट हो रहे हैं; तुम केवल उन्हींको देखो॥ ४७॥✎ 91

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #91 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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