इन समस्त रूपोंमें जीवोंके बाहर और भीतर वही एक स्वयंप्रकाश भगवान्, जो सम्पूर्ण आत्माओंके आत्मा हैं, मायाके द्वारा अनेकों प्रकारसे प्रकट हो रहे हैं; तुम केवल उन्हींको देखो॥ ४७॥✎ 91
तदिदं भगवान् राजन्नेक आत्माऽऽत्मनां स्वदृक्।
अन्तरोऽनन्तरो भाति पश्य तं माययोरुधा॥ ४७
इन समस्त रूपोंमें जीवोंके बाहर और भीतर वही एक स्वयंप्रकाश भगवान्, जो सम्पूर्ण आत्माओंके आत्मा हैं, मायाके द्वारा अनेकों प्रकारसे प्रकट हो रहे हैं; तुम केवल उन्हींको देखो॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.13.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 144) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/13/47/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)