वहाँ वे त्रिकाल स्नान और विधिपूर्वक अग्निहोत्र करते हैं। अब उनके चित्तमें किसी प्रकारकी कामना नहीं है, वे केवल जल पीकर शान्तचित्तसे निवास करते हैं॥ ५२॥✎ 92
स्नात्वानुसवनं तस्मिन्हुत्वा चाग्नीन्यथाविधि।
अब्भक्ष उपशान्तात्मा स आस्ते विगतैषणः॥ ५२
वहाँ वे त्रिकाल स्नान और विधिपूर्वक अग्निहोत्र करते हैं। अब उनके चित्तमें किसी प्रकारकी कामना नहीं है, वे केवल जल पीकर शान्तचित्तसे निवास करते हैं॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.13.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 145) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/13/52/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)