आसन जीतकर प्राणोंको वशमें करके उन्होंने अपनी छहों इन्द्रियोंको विषयोंसे लौटा लिया है। भगवान्की धारणासे उनके तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुणके मल नष्ट हो चुके हैं॥ ५३॥✎ 92
जितासनो जितश्वासः प्रत्याहृतषडिन्द्रियः।
हरिभावनया ध्वस्तरजःसत्त्वतमोमलः॥ ५३
आसन जीतकर प्राणोंको वशमें करके उन्होंने अपनी छहों इन्द्रियोंको विषयोंसे लौटा लिया है। भगवान्की धारणासे उनके तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुणके मल नष्ट हो चुके हैं॥ ५३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.13.53 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 145) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/13/53/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)