श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.13.54

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

विज्ञानात्मनि संयोज्य क्षेत्रज्ञे प्रविलाप्य तम्।

ब्रह्मण्यात्मानमाधारे घटाम्बरमिवाम्बरे॥ ५४

vijñānātmani saṃyojya kṣetrajñe pravilāpya tam|

brahmaṇyātmānamādhāre ghaṭāmbaramivāmbare|| 54

अर्थ

उन्होंने अहंकारको बुद्धिके साथ जोड़कर और उसे क्षेत्रज्ञ आत्मामें लीन करके उसे भी महाकाशमें घटाकाशके समान सर्वाधिष्ठान ब्रह्ममें एक कर दिया है। उन्होंने अपनी समस्त इन्द्रियों और मनको रोककर समस्त विषयोंको बाहरसे ही लौटा दिया है और मायाके गुणोंसे होनेवाले परिणामोंको सर्वथा मिटा दिया है। समस्त कर्मोंका संन्यास करके वे इस समय ठूँठकी तरह स्थिर होकर बैठे हुए हैं, अतः तुम उनके मार्गमें विघ्नरूप मत बनना*॥ ५४-५५॥✎ 92

यह अर्थ श्लोक 54–55 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. *

    देवर्षि नारदजी त्रिकालदर्शी हैं। वे धृतराष्ट्रके भविष्य-जीवनको वर्तमानकी भाँति प्रत्यक्ष देखते हुए उसी रूपमें वर्णन कर रहे हैं। धृतराष्ट्र पिछली रातको ही हस्तिनापुरसे गये हैं, अतः यह वर्णन भविष्यका ही समझना चाहिये।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 145)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #92 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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