श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.14.10

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

पश्योत्पातान्‍नरव्याघ्र दिव्यान् भौमान् सदैहिकान्।

दारुणान्१ शंसतोऽदूराद्भयं नो२ बुद्धिमोहनम्॥ १०

paśyotpātānnaravyāghra divyān bhaumān sadaihikān|

dāruṇān śaṃsato'dūrādbhayaṃ no buddhimohanam|| 10

अर्थ

भीमसेन! तुम तो मनुष्योंमें व्याघ्रके समान बलवान् हो; देखो तो सही—आकाशमें उल्कापातादि, पृथ्वीमें भूकम्पादि और शरीरोंमें रोगादि कितने भयंकर अपशकुन हो रहे हैं! इनसे इस बातकी सूचना मिलती है कि शीघ्र ही हमारी बुद्धिको मोहमें डालनेवाला कोई उत्पात होनेवाला है॥ १०॥✎ 93

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—घोरमाशंसतो।

    (मुद्रित पृष्ठ 147)
  2. २

    प्रा० पा०—मे।

    (मुद्रित पृष्ठ 147)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #93 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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