श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.17

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

सौत्ये वृतः कुमतिनाऽऽत्मद ईश्‍वरो मे

यत्पादपद्ममभवाय भजन्ति भव्याः।

मां श्रान्तवाहमरयो रथिनो भुविष्ठं

न प्राहरन् यदनुभावनिरस्तचित्ताः॥ १७

sautye vṛtaḥ kumatinā''tmada īśvaro me

yatpādapadmamabhavāya bhajanti bhavyāḥ|

māṃ śrāntavāhamarayo rathino bhuviṣṭhaṃ

na prāharan yadanubhāvanirastacittāḥ|| 17

अर्थ

श्रेष्ठ पुरुष संसारसे मुक्त होनेके लिये जिनके चरणकमलोंका सेवन करते हैं, अपने-आपतकको दे डालनेवाले उन भगवान्‌को मुझ दुर्बुद्धिने सारथितक बना डाला। अहा! जिस समय मेरे घोड़े थक गये थे और मैं रथसे उतरकर पृथ्वीपर खड़ा था, उस समय बड़े-बड़े महारथी शत्रु भी मुझपर प्रहार न कर सके; क्योंकि श्रीकृष्णके प्रभावसे उनकी बुद्धि मारी गयी थी॥ १७॥ ✎ 96 97

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #96 शब्दोंके बीचका स्थान: कोमुझ → को मुझ
  • #97 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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