श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.18

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

नर्माण्युदाररुचिरस्मितशोभितानि

हे पार्थ हेऽर्जुन सखे कुरुनन्दनेति।

संजल्पितानि नरदेव हृदिस्पृशानि

स्मर्तुर्लुठन्ति हृदयं मम माधवस्य॥ १८

narmāṇyudārarucirasmitaśobhitāni

he pārtha he'rjuna sakhe kurunandaneti|

saṃjalpitāni naradeva hṛdispṛśāni

smarturluṭhanti hṛdayaṃ mama mādhavasya|| 18

अर्थ

महाराज! माधवके उन्मुक्त और मधुरमुसकानसे युक्त, विनोदभरे एवं हृदयस्पर्शी वचन और उनका मुझे ‘पार्थ, अर्जुन, सखा, कुरुनन्दन’ आदि कहकर पुकारना, मुझे याद आनेपर मेरे हृदयमें उथल-पुथल मचा देते हैं॥ १८॥ ✎ 98 1283

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #98 शब्दोंके बीचका स्थान: उथल-पुथलमचा → उथल-पुथल मचा
  • #1283 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदय-स्पर्शी → हृदयस्पर्शी

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