॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.15.25
जलौकसां जले यद्वन्महान्तोऽदन्त्यणीयसः।
दुर्बलान्बलिनो राजन्महान्तो बलिनो मिथः॥ २५
jalaukasāṃ jale yadvanmahānto'dantyaṇīyasaḥ|
durbalānbalino rājanmahānto balino mithaḥ|| 25
अर्थ
राजन्! आपने द्वारकावासी अपने जिन सुहृद्-सम्बन्धियोंकी बात पूछी है, वे ब्राह्मणोंके शापवश मोहग्रस्त हो गये और वारुणी मदिराके पानसे मदोन्मत्त होकर अपरिचितोंकी भाँति आपसमें ही एक-दूसरेसे भिड़ गये और घूँसोंसे मार-पीट करके सब-के-सब नष्ट हो गये। उनमेंसे केवल चार-पाँच ही बचे हैं॥ २२-२३॥ वास्तवमें यह सर्वशक्तिमान् भगवान्की ही लीला है कि संसारके प्राणी परस्पर एक-दूसरेका पालन-पोषण भी करते हैं और एक-दूसरेको मार भी डालते हैं॥ २४॥ राजन्! जिस प्रकार जलचरोंमें बड़े जन्तु छोटोंको, बलवान् दुर्बलोंको एवं बड़े और बलवान् भी परस्पर एक-दूसरेको खा जाते हैं, उसी प्रकार अतिशय बली और बड़े यदुवंशियोंके द्वारा भगवान्ने दूसरे राजाओंका संहार कराया। तत्पश्चात् यदुवंशियोंके द्वारा ही एकसे दूसरे यदुवंशीका नाश कराके पूर्णरूपसे पृथ्वीका भार उतार दिया॥ २५-२६॥ ✎ 101 102