श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.26

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

एवं बलिष्ठैर्यदुभिर्महद्भिरितरान् विभुः।

यदून् यदुभिरन्योन्यं भूभारान् संजहार ह॥ २६

evaṃ baliṣṭhairyadubhirmahadbhiritarān vibhuḥ|

yadūn yadubhiranyonyaṃ bhūbhārān saṃjahāra ha|| 26

अर्थ

राजन्! आपने द्वारकावासी अपने जिन सुहृद‍्-सम्बन्धियोंकी बात पूछी है, वे ब्राह्मणोंके शापवश मोहग्रस्त हो गये और वारुणी मदिराके पानसे मदोन्मत्त होकर अपरिचितोंकी भाँति आपसमें ही एक-दूसरेसे भिड़ गये और घूँसोंसे मार-पीट करके सब-के-सब नष्ट हो गये। उनमेंसे केवल चार-पाँच ही बचे हैं॥ २२-२३॥ वास्तवमें यह सर्वशक्तिमान् भगवान्‌की ही लीला है कि संसारके प्राणी परस्पर एक-दूसरेका पालन-पोषण भी करते हैं और एक-दूसरेको मार भी डालते हैं॥ २४॥ राजन्! जिस प्रकार जलचरोंमें बड़े जन्तु छोटोंको, बलवान् दुर्बलोंको एवं बड़े और बलवान् भी परस्पर एक-दूसरेको खा जाते हैं, उसी प्रकार अतिशय बली और बड़े यदुवंशियोंके द्वारा भगवान्‌ने दूसरे राजाओंका संहार कराया। तत्पश्चात् यदुवंशियोंके द्वारा ही एकसे दूसरे यदुवंशीका नाश कराके पूर्णरूपसे पृथ्वीका भार उतार दिया॥ २५-२६॥ ✎ 101 102

यह व्याख्या श्लोक 1.15.22 से 1.15.26 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #101 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #102 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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