श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.29

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

वासुदेवाङ्घ्र्यनुध्यानपरिबृंहितरंहसा ।✎ 2007

भक्‍त्या निर्मथिताशेषकषायधिषणोऽर्जुनः॥ २९

vāsudevāṅghryanudhyānaparibṛṃhitaraṃhasā |

bhaktyā nirmathitāśeṣakaṣāyadhiṣaṇo'rjunaḥ|| 29

अर्थ

उनकी प्रेममयी भक्ति भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंके अहर्निश चिन्तनसे अत्यन्त बढ़ गयी। भक्तिके वेगने उनके हृदयको मथकर उसमेंसे सारे विकारोंको बाहर निकाल दिया॥ २९॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2007 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): वाङ्घ्रॺनुध्या → वाङ्घ्र्यनुध्या

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