श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.34

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

ययाहरद् भुवो भारं तां तनुं विजहावजः।

कण्टकं कण्टकेनेव द्वयं चापीशितुः समम्॥ ३४

yayāharad bhuvo bhāraṃ tāṃ tanuṃ vijahāvajaḥ|

kaṇṭakaṃ kaṇṭakeneva dvayaṃ cāpīśituḥ samam|| 34

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने लोकदृष्टिमें जिस यादवशरीरसे पृथ्वीका भार उतारा था, उसका वैसे ही परित्याग कर दिया, जैसे कोई काँटेसे काँटा निकालकर फिर दोनोंको फेंक दे। भगवान्‌की दृष्टिमें दोनों ही समान थे॥ ३४॥✎ 103

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #103 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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