भगवान् श्रीकृष्णने लोकदृष्टिमें जिस यादवशरीरसे पृथ्वीका भार उतारा था, उसका वैसे ही परित्याग कर दिया, जैसे कोई काँटेसे काँटा निकालकर फिर दोनोंको फेंक दे। भगवान्की दृष्टिमें दोनों ही समान थे॥ ३४॥✎ 103
ययाहरद् भुवो भारं तां तनुं विजहावजः।
कण्टकं कण्टकेनेव द्वयं चापीशितुः समम्॥ ३४
भगवान् श्रीकृष्णने लोकदृष्टिमें जिस यादवशरीरसे पृथ्वीका भार उतारा था, उसका वैसे ही परित्याग कर दिया, जैसे कोई काँटेसे काँटा निकालकर फिर दोनोंको फेंक दे। भगवान्की दृष्टिमें दोनों ही समान थे॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.15.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 155) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/15/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)