श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.35

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

यथा मत्स्यादिरूपाणि धत्ते जह्याद् यथा नटः।

भूभारः क्षपितो येन जहौ तच्च कलेवरम्॥ ३५

yathā matsyādirūpāṇi dhatte jahyād yathā naṭaḥ|

bhūbhāraḥ kṣapito yena jahau tacca kalevaram|| 35

अर्थ

जैसे वे नटके समान मत्स्यादि रूप धारण करते हैं और फिर उनका त्याग कर देते हैं, वैसे ही उन्होंने जिस यादवशरीरसे पृथ्वीका भार दूर किया था, उसे त्याग भी दिया॥ ३५॥✎ 103

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #103 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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