श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.40

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

विसृज्य तत्र तत् सर्वं दुकूलवलयादिकम्।

निर्ममो निरहङ्कारः संछिन्‍नाशेषबन्धनः॥ ४०

visṛjya tatra tat sarvaṃ dukūlavalayādikam|

nirmamo nirahaṅkāraḥ saṃchinnāśeṣabandhanaḥ|| 40

अर्थ

युधिष्ठिरने अपने सब वस्त्राभूषण आदि वहीं छोड़ दिये एवं ममता और अहंकारसे रहित होकर समस्त बन्धन काट डाले॥ ४०॥

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