॥ श्रीहरिः ॥
विसृज्य तत्र तत् सर्वं दुकूलवलयादिकम्।
निर्ममो निरहङ्कारः संछिन्नाशेषबन्धनः॥ ४०
visṛjya tatra tat sarvaṃ dukūlavalayādikam|
nirmamo nirahaṅkāraḥ saṃchinnāśeṣabandhanaḥ|| 40
अर्थ
युधिष्ठिरने अपने सब वस्त्राभूषण आदि वहीं छोड़ दिये एवं ममता और अहंकारसे रहित होकर समस्त बन्धन काट डाले॥ ४०॥
विसृज्य तत्र तत् सर्वं दुकूलवलयादिकम्।
निर्ममो निरहङ्कारः संछिन्नाशेषबन्धनः॥ ४०
युधिष्ठिरने अपने सब वस्त्राभूषण आदि वहीं छोड़ दिये एवं ममता और अहंकारसे रहित होकर समस्त बन्धन काट डाले॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.15.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 156) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/15/40/