॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.15.43
चीरवासा निराहारो बद्धवाङ् मुक्तमूर्धजः।
दर्शयन्नात्मनो रूपं जडोन्मत्तपिशाचवत्॥ ४३
cīravāsā nirāhāro baddhavāṅ muktamūrdhajaḥ|
darśayannātmano rūpaṃ jaḍonmattapiśācavat|| 43
अर्थ
इसके पश्चात् उन्होंने शरीरपर चीर-वस्त्र धारण कर लिया, अन्न-जलका त्याग कर दिया, मौन ले लिया और केश खोलकर बिखेर लिये। वे अपने रूपको ऐसा दिखाने लगे जैसे कोई जड, उन्मत्त या पिशाच हो॥ ४३॥