श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.44

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

अनपेक्षमाणो निरगादशृण्वन्बधिरो यथा।

उदीचीं प्रविवेशाशां गतपूर्वां महात्मभिः।

हृदि ब्रह्म परं ध्यायन्‍नावर्तेत यतो गतः॥ ४४

anapekṣamāṇo niragādaśṛṇvanbadhiro yathā|

udīcīṃ praviveśāśāṃ gatapūrvāṃ mahātmabhiḥ|

hṛdi brahma paraṃ dhyāyannāvarteta yato gataḥ|| 44

अर्थ

फिर वे बिना किसीकी बाट देखे तथा बहरेकी तरह बिना किसीकी बात सुने, घरसे निकल पड़े। हृदयमें उस परब्रह्मका ध्यान करते हुए, जिसको प्राप्त करके फिर लौटना नहीं होता, उन्होंने उत्तर दिशाकी यात्रा की, जिस ओर पहले बड़े-बड़े महात्माजन जा चुके हैं॥ ४४॥

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